गोस्वामी तुलसीदास की काव्य रचना

गोस्वामी तुलसीदास

कवि परिचय

  • गोस्वामी तुलसीदास का जन्म विक्रम संवत् 1589 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के गांव राजापुर में हुआ था।
  • उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे थे जो सरयूपारीण ब्राह्मण थे और माता का नाम हुलसी था।
  • कहते हैं कि अशुभ एवं अभुक्त नक्षत्र में पैदा हुए थे तथा जन्म लेते ही इनकी अवस्था पांच वर्ष के बालक के समान थी। तुलसी को उनके माता-पिता ने अनिष्ट की आशंका से उन्हें त्याग दिया था तथा मुनिया नामक दासी को दे दिया जिसने इनका पालन-पोषण किया।
  • इनके गुरु का नाम नरहरिदास बताया जाता है। इनकी पत्नी रत्नावली विदुषी थी किन्तु किसी कारणवश वैवाहिक जीवन अधिक समय तक न चला सका। अपनी पत्नी के झिड़की से तुलसी वैरागय को प्राप्त हुए और रामभक्ति में तीर्थ स्थानों पर भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुंचे, वहीं पर संवत् 1631 में उन्होंने 'रामचरितमानस' की रचना प्रारम्भ की। बाद में ये काशी आकार रहने लगे। जीवन के अंतिम दिनों में पीड़ा शांति के लिए उन्होंने हनुमान की स्तुति की जो 'हनुमान बाहुक' नाम से प्रसिद्ध है। संवत् 1680 में काशी के गंगाघाट पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसी का निधन हुआ।

काव्य रचना

  • तुलसीदास ने राम के अनन्य भक्त के रूप में दास्य भाव अपनाते हुए अनेक काव्य ग्रंथों की रचना की।
  • गोस्वामी तुलसीदास ने छोटे-बड़े 12 ग्रंथों को प्रामाणिक माना है, जो निम्नलिखित हैं-
  • दोहावली, कवितावली, गीतावली, रामचरितमानस, रामाज्ञा प्रश्नावली और विनयपत्रिका ये बड़े ग्रंथ हैं तथा रामलालनहछू, पार्वतीमंगल, जानकीमंगल, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी और श्रीकृष्णगीतावली छोटे ग्रंथ है।
  • तुलसीदास आदर्शवादी कवि थे।
  • उन्होंने आदर्श चरित्रों का सृजन कर दैनिक जीवन में उनके अनुकरण का संदेश दिया है।
  • इन सभी रचनाओं में भाव-वैविध्य गोस्वामी जी की सबसे बड़ी विशेषता है।
  • समन्वयवाद तुलसी की भक्ति भावना का सबसे बड़ा गुण है। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।
  • उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है- गार्हस्थ्य और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनासक्त चिंतन का समन्वय 'रामचरितमानस' के आदि से अंत तक दो छोरों पर जाने वाली पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।
  • वे अवधी और ब्रज भाषा दोनों के पंडित थे। दोनों भाषाओं का शुद्ध और परिमार्जित रूप इन्होंने अपनाया।

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